17 मार्च 2018

एंटरप्रेन्योर के बारे में इन चार बातों की चर्चा कोई नहीं करता है।




एक एंटरप्रेंयूअर होने की सच्ची कहानी लोकप्रिय बातचीत के बाहर की बात है। कुछ ख़राब बातें भी  एंटरप्रेंयूअर होने के साथ होती है।



  एंटरप्रेन्योर के  बारे में इन चार बातों की चर्चा कोई नहीं करता है।

1) जबरदस्त अकेलपन  का अहसास :

हम सभी को एक संदर्भ समूह का हिस्सा होने की आदत होती है।  जब आप एक स्थापित व्यवसाय के कर्मचारी हैं, तो आप अपने सहयोगियों के पास है। जब आप कॉलेज में होते हैं, तो आपके पास आपके सहपाठियों हैं और जब आप समुदाय में शामिल होते हैं, तो आपके पास साथी संगठन के सदस्य हैं।
 लेकिन जब आप कोई व्यवसाय शुरू करते हैं, तो आप वास्तव में स्वयं के हो। यदि आप भाग्यशाली हैं, तो आपके पास साथी या सह-संस्थापक हो सकता है, लेकिन तब भी वही अनुभव होता है  वही है।
 यह संदर्भ समूह नहीं होने के साथ अलग-अलग अलगाव और अकेलेपन की भावना है बहुत सारे लोग इस बारे में बात करना पसंद नहीं करते।  इसका कारण है कि  यह एक सफल उद्यमी के कथित व्यक्तित्व प्रकार के साथ फिट नहीं है, लेकिन अलगाव की भावना असली है।




2 ) अधिकांश व्यवसाय एक जीवन शैली और नौकरी प्रदान करते हैं, लेकिन वे धन प्रदान नहीं करते हैं :


उदाहरण के लिए, ज्यादातर रेस्तरां मालिक शायद घर लेते हुए एक आमदनी लेते हैं जो एक लोकप्रिय श्रृंखला में एक रेस्तरां मैनेजर द्वारा बनाई गई आय से ज्यादा नहीं है। यह समझना जरूरी है क्योंकि हम उद्यमियों के बारे में  काल्पनिक सोचते हैं जबकी  सच्चाई यह है कि ज्यादातर उद्यमियों का  काम नौकरी  जैसा ही है और यह  एक बहुत मुश्किल काम है।

यह एक महत्वपूर्ण ग़लतफ़हमी है जिसे अक्सर चर्चा नहीं की जाती है

3) आमतौर पर एक व्यवसाय बनाने में कई सालों लगते हैं:


मैंने अपने जीवनकाल में तीन व्यवसाय चलाए हैं: एक बहुत ही सरल व्यवसाय, मामूली सरल व्यापार और एक बहुत ही जटिल व्यवसाय। पहले व्यवसाय में, "साधारण", लाभ लेने के लिए मुझे एक साल लग गया दूसरे व्यवसाय को मुझे  मामूली लाभदायक बनने में तीन साल लग गए। तीसरे और सबसे जटिल व्यवसाय को लाभदायक और स्केलेबल बनाने के लिए, हमें खड़ा करने  और स्थापित करने में   छह साल लग गए। लाभदायक होने के लिए फेसबुक जैसे उद्यम को  भी  पांच साल लगा। एक व्यवसाय के लिए राजस्व और लाभप्रदता बढ़ना सामान्य नहीं है अधिकांश उद्यमियों के लिए, एक असली कंपनी बनाने के लिए कई सालों का समय लगता है;

4) आपको लोगों का प्रबंधन करना है

 जब आप कोई व्यवसाय चलाते हैं, तो आप केवल कर्मचारियों का ही नहीं बल्कि , लेकिन विक्रेताओं और ग्राहकों के साथ-साथ लगातार प्रबंधन  करते हैं। आप हमेशा बुरे व्यक्ति  होते हैं, आप मुश्किल निर्णय ले रहे हैं, और, कई मायनों में, आप अकेले ही  अपने निर्णयों के साथ होते । मेरे पास एक मित्र था जो एक व्यवसाय चलाता था और वह खुद को बुरा और धूर्त  के रूप में संदर्भित करता था: वह हमेशा बुरी खबर वाला व्यक्ति था  , वह हमेशा जरुरी  समस्या को सुलझाने वाला  आदमी था। लोगों को प्रबंधित करना आसान नहीं है, और यह कई लोगों के लिए स्वाभाविक रूप से नहीं आती है हालांकि, यह एक सफल व्यवसायी नेता और उद्यमी होने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


9 मार्च 2018

शक्तिपात की विधि

कल सत्संग  में गुरुदेव से  निखिल ने  पूछा " आपने आप को अधिक भाग्यशाली और जागरूक बनाने के लिए मैं और क्या करूँ ?"

"तुम अपना काम करो मैं अपना काम कर ही रहा हूँ "

मैने पूछा " मुझे यहाँ आने के पहले के वर्षों में अत्यंत उत्सुकता रहती थी पर अब नहीं है ?"

"पहले तुम्हारे पास बहुत से प्रश्न थे अब अहोभाव है "

इसी बीच गुरुदेव शक्तिपात के बारे में बताने लगे
" जब अंदर की शक्ति का विकास होता है तो पहले नेत्र से फिर मस्तिष्क से और अंत में अंगुलियों के पोरों से ऊर्जा निकलती है।  जब भी तुम्हे किसी को दीक्षा देनी हो तो शक्ति को अपने मूलाधार से आज्ञा चक्र पर ले आना।  साधक के इड़ा पिंगला को स्पर्श करके उसको मूलाधार की तरफ मोड़ देना। फिर मस्तिष्क के दोनों हिस्सों में ऊर्जा की हलचल को महसूस करके उसको  को सहस्त्रसार के तरफ दिशा देना।  अंत में गले की माला को अपने ओर खींचना।  फिर  अपने अंगूठे को  साधक के  आज्ञा चक्र में रख कर थोड़ा दबाव बनाकर  अपनी शक्ति को  उस पर प्रसारित करना। और तीन बार ॐ नमः शिवाय का मन में जाप करना। "


"  तुमको इस प्रक्रिया में साधक की एनर्जी के स्तर और उसकी विषमता का अनुभव होगा।  इस प्रक्रिया से उसकी ऊर्जा में समरूपता और गति आएगी। तुम्हारी ऊर्जा से उसकी नाड़ियाँ गति वान होकर उर्ध्व गामी होंगी।"

अंत में गुरुदेव ने कहा " तुमसे बन जायेगा। इसका प्रयास करते रहना। "



3 मार्च 2018

"परंपरा, जोखिम प्रबंधन और दांव लगाकर कार्य की अवधारणा ही सबसे बेहतर तरीका है"



 यह कहना की हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन वैज्ञानिक ज्ञान और तर्क  है पूरी तरह से अवैज्ञानिक और तर्कहीन है।   यह विज्ञान और वैज्ञानिकता को समझाता है। विज्ञान कठोर है, और है अपने  संकीर्ण दायरे  के बाहर कोई दावा नहीं करता है।


"परंपरा, जोखिम प्रबंधन और दांव लगाकर कार्य की  अवधारणा ही सबसे बेहतर तरीका  है"


यदि आप पारम्परिक ज्ञान को  "उच्च आयामीअनुभव" के रूप में नहीं स्वीकार करते हैं, तो आप विज्ञान और उसके  सांख्यिकीय महत्व के विरुद्ध खड़े होते हैं -  जो प्रयोगात्मक विज्ञान की रीढ़ की हड्डी सदृश है ।
 (पारम्परिक ज्ञान  ने 10 * 10 बार  काम किया है >>> जबकि कई वैज्ञानिक पेपर  60%  त्रुटि मिली है )






Science and reason is the best we have" is a statement that is both pseudoscientific & irrational.
It conflates science and scientism. Science is rigorous, makes no claims outside a v. narrow domain.



"Tradition, risk management, and Skin in the Game is the best we have".


If you do not treat Tradition as (high dimensional) "experience", you stand against science and statistical significance --the spine of experimental science.
What has worked 10^10 times  >>> some psych paper with 60% repl. error


प्रतिभा और भाग्य का तुलनात्मक अध्ययन


 इटली के  सामजिक भौतिकी  के स्कॉलर प्लचीनो , बायोण्डो ,और रपिसारदा ने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में एक रिसर्च पेपर 25 फरवरी 2018  को एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया है जिसमे उन्होने सफलता के मापदंडों के लिए  प्रतिभा और भाग्य का तुलनात्मक अध्ययन किया है।







उच्च प्रतिस्पर्धी पश्चिमी संस्कृतियों में  बड़े पैमाने पर प्रभावशाली मानदंड इस धारणा पर आधारित हैं कि सफलता के सभी कारणों में मुख्य रूप से, प्रतिभा, बुद्धि, कौशल, प्रयास या जोखिम लेने जैसी व्यक्तिगत गुणों के जिम्मेदार हैं।  कभी-कभी, यह भी स्वीकार करना पड़ता है की  सांसारिक सफलता के लिए कुछ मात्रा में भाग्य भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेकिन, तथ्य की बात यह है कि, व्यक्तिगत सफल कहानियों में बाहरी शक्तियों के महत्व को कम करके देखना आम बात है।
यह बहुत अच्छी तरह से ज्ञात है कि बुद्दिमत्ता  या प्रतिभा जनसंख्या के बीच एक गाऊसी वितरण प्रदर्शित करते हैं, जबकि धनी बनाना  - सफलता का एक पैमाना  माना जाता है - आम तौर पर एक शक्ति कानून (पारेटो कानून) का पालन करता है।
एक सामान्य स्तर के साथ इनपुट के सामान्य वितरण और आउटपुट के पैमाने पर अपरिवर्तनीय वितरण के बीच इस तरह की विसंगति से पता चलता है कि कुछ छिपे हुए तत्व भी इस प्रकार के  परिदृश्यों के पीछे काम करते हैं।
इस रिसर्च पेपर  में, एक बहुत सरल, एजेंट-आधारित मॉडल की मदद से, हम एक  विशेष पैरामीटर अराजकता randomness  को लेकर देखते है।     हम यह बताते हैं कि यद्यपि  जीवन में सफल होने के लिए कुछ स्तरों की प्रतिभा आवश्यक है, तब भी कभी भी ऐसा नहीं होता की  सबसे प्रतिभाशाली लोग सफलता के उच्चतम चोटियों तक पहुंचे , बल्कि  औसत दर्जे की प्रतिभा और समझदारी वाले  भाग्यशाली लोग  इनसे आगे निकल जाते है  हैं।
इस पेपर   के परिणाम स्वरुप हम  पहली बार मात्रात्मक अध्ययन के पैमाने से उस बात को  साबित करने में सफल हुए है  , जिसको हर हमेशा ज्ञान के विशाल साम्रग्रीयों के बीच इंगित किया जाता था।    सफलता के  एक स्तर तक पहुंचने के लिये जरुरी  कौशल के प्रभाव की क्षमता के आंकलन पर  इस पेपर नई दृष्टि प्रदान की है।  इसके साथ यह भी बताता है अत्यधिक सम्मान और संसाधनों के वितरण में यह  जोखिम है की  वो व्यक्ति दूसरों से ज्यादा काबिल होने के बजाय सिर्फ दूसरों से  ज्यादा भाग्यशाली हो।

इस मॉडल की सहायता से, कई नीतिगत अवधारणाओं को भी संबोधित किया जाता है और तुलनात्मक गुण, विविधता और नवीनता में सुधार के लिए अनुसंधान के सार्वजनिक वित्त पोषण के लिए सबसे अधिक कुशल रणनीतियां क्या हो सकतीं  हैं।


1 मार्च 2018

" स्वर्ण विजेता योद्धा रियल लाइफ में फिस्सडी साबित हुआ "

 " स्वर्ण विजेता योद्धा  रियल लाइफ में फिस्सडी साबित हुआ "


 मार्क स्पिट्जनागल ने "ल्यूडिक विभ्रम" को एक  मार्शल आर्ट के योद्धा के सरल उदाहरण से समझाया है।



 "मार्शल आर्ट के योद्धा को कॉम्पिटिशन में जीतने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। उसकी एकाग्रता को बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण में उन तत्वों को शामिल नहीं किया जाता है जिनकी नियम अनुमति नहीं देतें है जैसे की गले में किक मरना ,या फिर अचानक से चाकू निकाल लेना।
इसका अर्थ ये है की प्रतियोगिता में स्वर्ण विजेता वास्तविक जीवन की लड़ाई में कमजोर साबित होगा क्यूंकि उसका प्रशिक्षण ही एक विशेष माहौल में हुआ है जिसका यथार्थ के धरातल में वजूद नहीं है। "





LUDIC  ल्यूडिक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ होता है खेल।    खेल के अवधारणा को  वास्तविक जीवन में उपयोग  करने से जो विभ्रम उत्पन्न होता है उसे ल्यूडिक विभ्रम कहते हैं। सांखियकी के सामान्य और सरल  नियमों को शेयर मार्केट जैसे अत्यंत जटिल वातावरण में उपयोग करने से ल्यूडिक विभ्रम जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। तालिब ने इस तर्क को उन सभी सांखियकीय समीकरणों के विरोध में दिया है जो शेयर  मार्केट के भविष्य के आंकलन के लिए उपयोग में लाये जाते है। 

महान लेखक जान पॉल सात्रे ने 1964 में नोबेल पुरूस्कार लेने से इंकार कर दिया

  महान लेखक जान पॉल सात्रे  ने 1964 में नोबेल पुरूस्कार लेने से इंकार कर दिया। उन्होने इस अवसर पर जो पत्र लिखा है वह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह इतिहास में दर्ज है।








 मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है कि इस मुद्दे को सनसनीखेज़ घटना की तरह देखा जा रहा है: एक पुरस्कार मुझे दिया गया था और इसे मैंने लेने से इंकार कर दिया।

यह  सब इसलिए हुआ कि मुझे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि भीतर ही भीतर क्या चल रहा है। 15 अक्टूबर, ‘फ़िगारो लिट्रेरिया’ के स्वीडिश संवाददाता स्तम्भ में मैंने जब पढ़ा कि स्वीडिश अकादमी का रुझान मेरी तरफ है, लेकिन फिर भी ऐसा कुछ निश्चित नहीं हुआ है, तो मुझे लगा कि अकादमी को इस बाबत ख़त लिखना चाहिए जिसे मैंने अगले दिन ही लिखकर रवाना कर दिया ताकि इस मसले की मालूमात कर लूं और भविष्य में इस पर कोई चर्चा न हो।

तब मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्तकर्ता की सहमति के बगैर ही प्रदान किया जाता है। मुझे लग रहा था कि वक्त बहुत कम है और इसे रोका जाना चाहिए, लेकिन अब मैं जान गया हूं कि स्वीडिश अकादमी के किसी फ़ैसले को बाद में मंसूख करना संभव नहीं।

जैसा कि मैं अकादमी को लिखे पत्र में ज़ाहिर कर चुका हूं, मेरे इंकार करने का स्वीडिश अकादमी या नोबेल पुरस्कार के किसी प्रसंग से कोई लेना-देना नहीं है। दो वजहों का ज़िक्र मैंने वहां किया है: एक तो व्यक्तिगत और दूसरे मेरे अपने वस्तुनिष्ठ उद्देश्य।

मेरा प्रतिषेध आवेशजनित नहीं है। निजीतौर पर मैंने आधिकारिक सम्मानों को हमेशा नामंजूर ही किया है। 1945 में युद्ध के बाद मुझे लिजन ऑफ़ ऑनर (Legion of Honor) मिला था। मैंने लेने से इंकार कर दिया, यद्यपि मेरी सहानुभूति सरकार के साथ थी। इसी तरह अपने दोस्तों के सुझाव के बावज़ूद भी ‘कॉलेज द फ़्रांस’ में घुसने की मेरी कभी चेष्टा नहीं रही।

इस नज़रिए के पीछे लेखक के जोख़िम भरे उद्यम के प्रति मेरी अपनी अवधारणा है। एक लेखक जिन भी राजनैतिक, सामाजिक या साहित्यिक जगहों पर मोर्चा लेता है,  वहां वह अपने नितांत मौलिक साधन- यानी ‘लिखित शब्दों’ के साथ ही मौज़ूद होता है। वे सारे सम्मान जिनकी वजह से उसके पाठक अपने ऊपर दबाब महसूस करने लगें, आपत्तिजनक हैं। बतौर ज्यां-पाल सार्त्र के दस्तख़त या नोबेल पुरस्कार विजेता ज्यां-पाल सार्त्र के दस्तखतों में भारी अंतर है।

एक लेखक जो ऐसे सम्मानों को स्वीकार करता है, वस्तुतः खुद को एक संघ या संस्था मात्र में तब्दील कर देता है। वेनेजुएला के क्रांतिकारियों के प्रति मेरी संवेदनाएं एक तरह से मेरी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं, पर यदि मैं नोबेल पुरस्कार विजेता, ज्यां-पाल सार्त्र की हैसियत से वेनेजुएला के प्रतिरोध को देखता हूं तो एक तरह से ये प्रतिबद्धताएं नोबेल पुरस्कार के रूप में एक पूरी संस्था की होंगी। एक लेखक को इस तरह के रूपांतरण का विरोध करना चाहिए, चाहें वह बहुत सम्मानजनक स्थितियों में ही क्यों न घटित हो रहा हो, जैसा कि आजकल हो रहा है।

यह नितांत मेरा अपना तौर-तरीका है और इसमें अन्य विजेताओं के प्रति किसी भी तरह का निंदा भाव नहीं। यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे कई सम्मानित लोगों से मेरा परिचय है और मैं उन्हें आदर तथा प्रशंसा की दृष्टि से देखता हूं।

कुछ कारणों का संबंध सीधे मेरे उद्देश्यों से जुड़ा है: जैसे, सांस्कृतिक मोर्चे पर केवल एक-ही तरह की लड़ाई आज संभव है- दो संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की लड़ाई। एक तरफ पूर्व है और दूसरी तरफ पश्चिम। मेरे कहने का यह अभिप्राय भी नहीं कि ये दोनों एक-दूसरे को गले से लगा लें- मैं भलीभांति इस सच को जानता हूं कि ये दोनों संस्कृतियां आमने-सामने खड़ीं हैं और अनिवार्य रूप से इनका स्वरूप द्वंद्वात्मक है- पर यह झगड़ा व्यक्तियों और संस्कृतियों के बीच है और संस्थाओं का इसमें कोई दखल नहीं।

दो संस्कृतियों के इस विरोधाभास ने मुझे भी गहरे तक प्रभावित किया है। मैं ऐसे ही विरोधाभासों की निर्मिती हूं। इसमें कोई शक नहीं कि मेरी सारी सहानुभूतियां समाजवाद के साथ हैं और इसे हम पूर्वी-ब्लॉक के नाम से भी जानते हैं; पर मेरा जन्म और मेरी परवरिश बूर्जुआ परिवार और संस्कृति के बीच हुई है। ये सब स्थितियां मुझे इस बात की इज़ाज़त देती हैं कि मैं इन दोनों संस्कृतियों को करीब लाने की कोशिश कर सकूं।  ताहम, मैं उम्मीद करता हूं कि “जो सर्वश्रेष्ठ होगा,वही जीतेगा.” और वह है –समाजवाद।

इसलिए मैं ऐसे सम्मान को स्वीकार नहीं कर सकता जो सांस्कृतिक प्राधिकारी वर्ग के ज़रिये मुझे मिल रहा हो। चाहें वह पश्चिम के बदले पूर्व की ओर से ही क्यों न दिया गया हो, चाहें मेरी संवेदनाएं दोनों के अस्तित्व के लिए ही क्यों न पुर-फ़िक्र हों, जबकि मेरी सारी सहानुभूति समाजवाद के साथ है, यदि कोई मुझे ‘लेनिन पुरस्कार’ भी देता तब भी मेरी यही राय रहती और मैं इंकार करता...जबकि दोनों बातें एकदम अलहदा हैं।

मैं इस बात से भी वाकिफ़ हूं कि नोबेल पुरस्कार पश्चिमी खेमे का साहित्यिक पुरस्कार नहीं है, पर मैं यह जानता हूं कि इसे कौन महत्त्वपूर्ण बना रहा है, और कौनसी वारदातें जो कि स्वीडिश अकादमी के कार्यक्षेत्र के बाहर है, इसे लेकर घट रही हैं –इसलिए सामयिक हालातों में यह सुनिश्चित हो जाता है कि नोबेल पुरस्कार पूर्व और पश्चिम के बीच फांक पैदा करने के लिए या तो पश्चिम के लेखकों की थाती हो गया है, या फिर पूरब के विद्रोहियों के लिए आरक्षित है। यथा,ये कभी नेरुदा को नहीं दिया गया जो दक्षिण अमेरिका के महान कवियों में से हैं। कोई इस पर गंभीरता से नहीं सोचेगा कि इसे लुइ अरागोन को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए जबकि वह इसके हकदार हैं। यह अफ़सोसजनक था कि शोलकोव की जगह पास्टरनक को सम्मानित किया गया था, जो अकेले ऐसे रूसी लेखक थे, जिनका विदेशों में प्रकाशित काम सम्मानित हुआ जबकि अपने ही वतन में यह प्रतिबंधित किया गया था।

दूसरी तरह से भी संतुलन स्थापित हो सकता था। अल्जीरिया के मुक्ति संग्राम में जब हम सब“121 घोषणापत्र”पर दस्तखत कर रहे थे, तब यदि यह सम्मान मुझे मिलता तो मैं इसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार कर लेता क्योंकि यह केवल मेरे प्रति सम्मान न होता बल्कि उस पूरे मुक्ति-संग्राम के प्रति आदर-भाव होता जो उन दिनों लड़ा जा रहा था। लेकिन चीज़ें इस दिशा में,इस तरह नहीं हुईं।
अपने उद्देश्यों पर चर्चा करते वक्त स्वीडिश अकादमी को कम-अज-कम उस शब्द का ज़िक्र तो करना चाहिए था –जिसे हम ‘आज़ादी’ कहते हैं और जिसके कई तर्जुमें हैं. पश्चिम में इसका अर्थ सामान्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सन्दर्भों तक सीमित है- अर्थात् एक ऐसी ठोस आज़ादी, जिसमें आपको एक जोड़ी जूते से अधिक पहनने और दूसरे के हिस्से की भूख हड़प लेने का अधिकार है। अतः मुझे लगा कि सम्मान से इंकार करना कम खतरनाक है, बजाय इसे स्वीकार करने के। यदि मैं इसे स्वीकार कर लेता तो यह खुद को “उद्देश्यों के पुनर्वास” हेतु सौंपना होता।

‘फ़िगारो लिट्रेरिया’में प्रकाशित लेख के अनुसार, “किसी भी तरह के विवादास्पद राजनैतिक अतीत से मेरा नाम नहीं जुड़ा था।” लेख का मंतव्य अकादमी का मंतव्य नहीं था और मैं जानता था कि दक्षिणपंथियों में मेरी स्वीकारोक्ति को क्या जामा पहनाया जाता। मैं “विवादित राजनैतिक अतीत” को आज भी जायज़ ठहराता हूं। मैं इस बात के लिए भी तैयार हूं कि यदि अतीत में मेरे कॉमरेड दोस्तों से कोई गलती हुई हो तो बेहिचक मैं उसे कुबूल कर सकूं।

इसका यह अर्थ भी न लगाया जाए कि ‘नोबेल पुरस्कार’ बूर्जुआ मानसिकता से प्रेरित है, लेकिन निश्चित रूप से ऐसे कई गुटों में, जिनकी नस-नस से मैं वाकिफ़ हूँ, इसकी कई बूर्जुआ व्याख्याएं जरूर की जायेंगी।

अंत में, मैं उस देय निधि के प्रश्न पर बात करूंगा। पुरस्कृत व्यक्ति के लिए यह भारस्वरूप है। अकादमी समादर-सत्कार के साथ भारी राशि अपने विजेताओं को देती है। यह एक समस्या है जो मुझे सालती है। अब या तो कोई इस राशि को स्वीकार करे और इस निधि को अपनी संस्थाओं और आंदोलनों पर लगाने को अधिक हितकारी समझे –जैसा कि मैं लन्दन में बनी रंग-भेद कमिटी को लेकर सोचता हूं; या फिर कोई अपने उदार सिद्धांतों की खातिर इस राशि को लेने से इंकार कर दे, जो ऐसे वंचितों के समर्थन में काम आती, लेकिन मुझे यह झूठ-मूठ की समस्या लगती है। ज़ाहिर है मैं 250,000 क्राउंस की क़ुरबानी दे सकता हूं क्योंकि मैं खुद को एक संस्था में रूपांतरित नहीं कर सकता –चाहे वह पूर्व हो या पश्चिम। पर किसी को यह कहने का हक़ भी नहीं है कि 250,000 क्राउंस मैं यूं ही कुर्बान कर दूं जो केवल मेरे अपने नहीं हैं, बल्कि मेरे सभी कॉमरेड दोस्तों और मेरी विचारधारा से भी तालुक्क रखते हैं।

इसलिए ये दोनों बातें- पुरस्कार लेना या इससे इंकार करना, मेरे लिए तकलीफ़देह है।

इस पैगाम के साथ मैं यह बात यहीं समाप्त करता हूं कि स्वीडिश जनता के साथ मेरी पूर्ण सहानुभूति है और मैं उनसे इत्तेफ़ाक रखता हूं।

28 फ़रवरी 2018

आजकल विराट कोहली चल रहा है

"और क्या चल रहा है ?"  एक कॉफी शॉप में एक नवयुवक ने अपने मित्र से पूछा।
"आजकल  विराट कोहली चल रहा है " मित्र ने जवाब दिया।



इंडिया और साऊथ अफ्रीका में  इंडिया टीम की जीत ऐतिहासिक के बाद कोहली से पूछा गया की आप की जीत और परफॉरमेंस का राज क्या है ?
  "वर्क इथिक्स  और  फ्रेम ऑफ़ माइंड " विराट ने कहा ।



(सेल्फ हेल्प के लिए विराट का एप्रोच एक नई सीख है )